Friday, 11 March 2016

कण्ठमाला (Tonsillitis)

कण्ठमाला (Tonsillitis)

परिचय:-

कण्ठमाला रोग से पीड़ित रोगी की गर्दन में गांठें हो जाती हैं जिसके कारण उसके शरीर में मल का विष अधिक बढ़ जाता है जिसकी सफाई होना बहुत बहुत आवश्यक है।
कण्ठमाला का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-

इस रोग को ठीक करने के लिए रोगी को 2 दिन के लिए उपवास रखना चाहिए और उपवास के समय में केवल फलों का रस पीना चाहिए तथा एनिमा क्रिया करके पेट को साफ करना चाहिए। इसके बाद रोगी को प्रतिदिन उदरस्नान तथा मेहनस्नान करना चाहिए।
कण्ठों के पास की गांठों पर भापस्नान देकर दिन में 3 बार मिट्टी की पट्टी बांधनी चाहिए और रात के समय में इन गांठों पर हरे रंग की बोतल का सूर्यतप्त तेल लगाना चाहिए।
यदि रोगी की गर्दन पर गांठ बननी शुरू हुई है तो तुलसी और अरण्डी की पत्ती बराबर मात्रा में लेकर और पीसकर फिर उनमें थोड़ा-सा नमक मिलाकर गर्म-गर्म ही गांठ पर बांध देने से रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है और रोगी का रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
इस रोग से पीड़ित रोगी को आसमानी रंग की बोतल का सूर्यतप्त जल 2 भाग तथा लाल रंग की बोतल का सूर्यतप्त जल 1 भाग मिलाकर लगभग 25 मिलीलीटर की मात्रा में दिन में 2 बार सेवन करने से तथा गांठों पर लगभग 10 मिनट तक नीला प्रकाश डालने और सप्ताह में 1-2 बार एप्सम साल्टबाथ (गर्म पानी में हल्का नमक डालकर, उस पानी से स्नान करना) भी करने से यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है। इस उपचार को करने के साथ-साथ व्यक्ति को शरीर और सांस की हल्की कसरत भी करनी चाहिए।

Monday, 7 March 2016

Maha shivratri pooja vidhi

।। महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ ।।
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

महाशिवरात्रि पूजन : शिवपुराण विधि विधान
(शिवरात्रि पूजन शिवपुराण के अनुसार करें(
🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻

शिवपुराण की कोटिरुद्रसंहिता में बताया गया है कि शिवरात्रि व्रत करने से व्यक्ति को भोग एवं मोक्ष दोनों ही प्राप्त होते हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा पार्वती के पूछने पर भगवान सदाशिव ने बताया कि शिवरात्रि व्रत करने से महान पुण्य की प्राप्ति होती है। मोक्ष की प्राप्ति कराने वाले चार संकल्प पर नियमपूर्वक पालन करना चाहिए।
ये चार संकल्प हैं-
शिवरात्रि पर भगवान शिव की पूजा, रुद्रमंत्र का जप, शिवमंदिर में उपवास तथा काशी में देहत्याग। शिवपुराण में मोक्ष के चार सनातन मार्ग बताए गए हैं। इन चारों में भी शिवरात्रि व्रत का विशेष महत्व है। अतः इसे अवश्य करना चाहिए।
यह सभी के लिए धर्म का उत्तम साधन है। निष्काम अथवा सकामभाव से सभी मनुष्यों, वर्णों, स्त्रियों, बालकों तथा देवताओं के लिए यह महान व्रत परम हितकारक माना गया है। प्रत्येक मास के शिवरात्रि व्रत में भी फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी में होने वाले महाशिवरात्रि व्रत का शिवपुराण में विशेष महात्म्य है।
🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻

उपवास में रात्रि जागरण क्यों? :-

ऋषि मुनियों ने समस्त आध्यात्मिक अनुष्ठानों में उपवास को महत्वपूर्ण माना है। 'विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देनिहः' के अनुसार उपवास विषय निवृत्ति का अचूक साधन है। अतः आध्यात्मिक साधना के लिए उपवास करना परमावश्यक है। उपवास के साथ रात्रि जागरण के महत्व पर संतों का यह कथन अत्यंत प्रसिद्ध है-'या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।'
इसका सीधा तात्पर्य यही है कि उपासना से इन्द्रियों और मन पर नियंत्रण करने वाला संयमी व्यक्ति ही रात्रि में जागकर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील हो सकता है। अतः शिवोपासना के लिए उपवास एवं रात्रि जागरण उपयुक्त हो सकता है? रात्रि प्रिय शिव से भेंट करने का समय रात्रि के अलावा और कौन समय हो सकता है?
इन्हीं सब कारणों से इस महान व्रत में व्रतीजन उपवास के साथ रात्रि में जागकर शिव पूजा करते हैं। इसलिए महाशिवरात्रि को रात के चारों पहरों में विशेष पूजा की जाती है। सुबह आरती के बाद यह उपासना पूर्ण होती है।
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷
महाशिवरात्रि पूजा विधि : -
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷
शिवपुराण के अनुसार व्रती पुरुष को प्रातः काल उठकर स्नान संध्या कर्म से निवृत्त होने पर मस्तक पर भस्म का तिलक और गले में रुद्राक्षमाला धारण कर शिवालय में जाकर शिवलिंग का विधिपूर्वक पूजन एवं शिव को नमस्कार करना चाहिए। तत्पश्चात उसे श्रद्धापूर्वक व्रत का इस प्रकार संकल्प करना चाहिए-
शिवरात्रिव्रतं ह्येतत्‌ करिष्येऽहं महाफलम।
निर्विघ्नमस्तु से चात्र त्वत्प्रसादाज्जगत्पते

यह कहकर हाथ में लिए पुष्पाक्षत्‌ जल आदि को छोड़ने के पश्चात यह श्लोक पढ़ना चाहिए-
देवदेव महादेव नीलकण्ठ नमोऽस्तु से
कर्तुमिच्छाम्यहं देव शिवरात्रिव्रतं तव।
तव प्रसादाद्देवेश निर्विघ्नेन भवेदिति।
कामाशः शत्रवो मां वै पीडां कुर्वन्तु नैव हि

हे देवदेव! हे महादेव! हे नीलकण्ठ! आपको नमस्कार है। हे देव! मैं आपका शिवरात्रि व्रत करना चाहता हूं। हे देवश्वर! आपकी कृपा से यह व्रत निर्विघ्न पूर्ण् हो और काम, क्रोध, लोभ आदि शत्रु मुझे पीड़ित न करें।
रात्रि पूजा का विधान :-
दिनभर अधिकारानुसार शिवमंत्र का यथाशक्ति जप करना चाहिए अर्थात्‌ जो द्विज हैं और जिनका विधिवत यज्ञापवीत संस्कार हुआ है तथा नियमपूर्वक यज्ञोपवीत धारण करते हैं। उन्हें ॐ नमः शिवाय मंत्र का जप करना चाहिए परंतु जो द्विजेतर अनुपनीत एवं स्त्रियां हैं, उन्हें प्रणवरहित केवल शिवाय नमः मंत्र का ही जप करना चाहिए।
रुग्ण, अशक्त और वृद्धजन दिन में फलाहार ग्रहण कर रात्रि पूजा कर सकते हैं, वैसे यथाशक्ति बिना फलाहार ग्रहण किए रात्रिपूजा करना उत्तम है।
रात्रि के चारों प्रहरों की पूजा का विधान शास्त्रकारों ने किया है। सायंकाल स्नान करके किसी शिवमंदिर जाकर अथवा घर पर ही सुविधानुसार पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख होकर और तिलक एवं रुद्राक्ष धारण करके पूजा का इस प्रकार संकल्प करे-देशकाल का संकीर्तन करने के अनंतर बोले- 'ममाखिलपापक्षयपूर्वकसकलाभीष्टसिद्धये शिवप्रीत्यर्थ च शिवपूजनमहं करिष्ये।' अच्छा तो यह है कि किसी वैदिक विद्वान ब्राह्मण के निर्देश में वैदिक मंत्रों से रुद्राभिषेक का अनुष्ठान करवाएं।

🙏 श्री त्रिपुरसुन्दरी वेदगुरुकुलम् 🙏
आचार्य धीरेन्द्र

Tuesday, 16 February 2016

Vedant (वेदांत)

वेदांत 
वेदांत शब्द 'वेद' और 'अंत' इन दो शब्दों के मेल से बना है, अत: इसका वाक्यार्थ वेद अथवा वेदों का अंतिम भाग है। वैदिक साहित्य मुख्यत: तीन भागों में विभक्त है-
कर्मकाण्ड
ज्ञानकाण्ड
उपासनाकाण्ड
साधारणत: वैदिक साहित्य के ब्राह्मण भाग को, जिसका सम्बन्ध यज्ञों से है, उसे कर्मकाण्ड कहते हैं
उपनिषदें ज्ञानकाण्ड कहलाती हैं जिसमें उपासना भी सम्मिलित है।
उपासनाकाण्ड का अर्थ क्रमश: 'तात्पर्य', 'सिद्धांत' तथा 'आंतरिक अभिप्राय' अथवा मंतव्य भी किया गया है।
देवी-देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी, सारा विश्वप्रपच, नाम-रूपात्मक जगत ब्रह्म से भिन्न नहीं; यही वेदांत अर्थात वेदसिद्धांत है। जो कुछ दृष्टिगोचर होता है, जो कुछ नाम-रूप से सम्बोधित होता है, उसकी सत्ता ब्रह्म की सत्ता से भिन्न नहीं।
मनुष्य का एक मात्र कर्त्तव्य ब्रह्मज्ञान प्राप्ति, ब्रह्ममयता, ब्रह्मस्वरूप की प्राप्ति है। यही एक बात वेदों का मौलिक सिद्धांत, अंतिम तात्पर्य तथा सर्वोच्च-सर्वमान्य अभिप्राय है। यही वेदांत शब्द का मूलार्थ है। इस अर्थ में वेदांत शब्द से उपनिषद ग्रंथों का साक्षात्‌ बोध होता है। परवर्ती काल में वेदांत का तात्पर्य वह दार्शनिक सम्प्रदाय भी हो गया जो उपनिषदों के आधार पर केवल ब्रह्म की ही एक मात्र सत्ता मानता है। कई सूक्ष्म भेदों के आधार पर इसके कई उपसम्प्रदाय भी हैं, जैसे अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैतवाद आदि।
भर्तुमित्र, जयन्त कृत 'न्यायमंजरी' तथा यामुनाचार्य के 'सिद्धित्रय' वेदांत आचार्य रहे थे।
Acharya Dhirendra
Shri Tripursundari ved Gurkulam

Saturday, 6 February 2016

नरक चतुर्दशी

नरक निवारण चतुर्दशी कल है ।💐मौनी आमावस्या💐
08-02-2016 इस आमवस्या का विशेष महत्त्व माना गया हैं। इसको "दर्श अमावस्या" "योग अमावस्या" भी कहा गया हैं। कल के दिन आपके पूजा-पाठ, व्रत-उपवास करने से आप अपने कुंडली के अशुभ ग्रहों को शुभ बना सकते हैं।

हमारे शास्त्रों में "मौन" को बहुत बड़ा व्रत माना जाता हैं। तपश्चर्या करने वाले और मौन रहकर आध्यात्म और धर्म की सेवा साधना करने वाले संतों को हमारे सामाजिक जीवन में  "मुनि" कहा जाता हैं। मौन सबसे बड़ी साधना है और मौन व्रती की आतंरिक शक्तियां इतनी अधिक विकसित हो  जाती हैं कि वह साधक को संसार की समस्त वस्तुएँ सहज ही उपलब्ध करवा देती हैं। गौतम बुद्ध जैसे साधक भी अपनी मौन साधना की वजह से जगत्प्रसिद्ध हो गए हैं। 🍀
वास्तव में अमावस्या तिथि को हम पितरों के निमित्त अपनी जो भी श्रद्धा और समर्पण का भाव और सम्मान अर्पित करते है उनसे हमारे पितृ देव सब प्रसन्न होकर हमें आशीर्वाद देते है और उनके इस उपकार से हम उनका आशीर्वाद पाकर अपने ग्रह दोषों को अनुकूल बना सकते हैं। इसी पितृ पूजा को हम हमेशा से अमावस्या को करते आये हैं। कल की अमावस्या का भी इसी क्रम में विशेष महत्त्व बन गया हैं। कल के दिन का व्रत करने से पूजा आदि करने से हम अपने कुंडली के अशुभ ग्रह के साथ साथ अपने जीवन में हो रही आर्थिक परेशानियों, लड़ाई झगड़ा, कर्ज आदि से भी मुक्ति पा सकते है।🍀
💢 अब आइये जानते है की क्या कैसे पूजा करनी है और किसकी करनी है ?
मृत्यु पश्चात् मुक्ति के देवता महादेव श्री शंकर जी ही हमारे पितरों से आशीर्वाद दिलाने वाले देवता हैं। कल एक तो चतुर्दशी, और ऊपर से रविवार का दिन और नरक निवारण चतुर्दशी साथ साथ माघ का पावन महीना और मौनी अमावस्या इन सबका एक अद्भुत संयोग बना है जो आपके थोड़े से पूजा पाठ प्रयास से आपको  बहुत अधिक सफलता दिला सकता हैं।🍀
🌹कल सुबह और परसो भी स्नान ध्यान पश्चात् आप थोड़ी देर या कुछ घंटे या जितना संभव है उतना देर मौन व्रत  रखिये और स्नान के समय ही अपने पितृ देवों के उद्धार के लिए व्रत का संकल्प लेना हैं। अपनी श्रद्धा भक्ति के अनुसार आप भगवान शिव जी की पूजा अर्चना करिये। अपने गुरु प्रदत्त मन्त्र या अपने इष्ट का मंत्र जाप पूजा करिये  और उनसे अपने कष्टों के निवारण की प्रार्थना करिये। कल पीपल को काला तिल डालकर जल देकर अपने पितरों से एवं श्री नारायण और माता महालक्षमी से अपने ओवर कृपा की प्रार्थना करिये।
किसी धर्मानुचारी ब्राह्मण को अपने  यहाँ बुलाकर श्रद्धा पूर्वक भोजन आदि करवाकर दान दीजिये। गाय को और किसी निर्धन को भोजन करवा कर आप अपने समस्त जाने अनजाने पापों का नाश कर सकते हैं। कल के और परसो के दिन आप किसी पुण्य स्थल, धर्म स्थल, पवित्र नदी पर स्नान दान जाप पूजा किसी भी प्रकार का पुण्य आपके समस्त पापों का नाश करके आपके जीवन को सफल बना सकता हैं। 🍀🙏 निवेदन करना है की सोमवार के दिन कम से कम क्रोध करिये और जादा से जादा मौन रहिये। मौन से हमारे शरीर में ऊर्जा का विशेष संग्रह होता है और सकारात्मक ऊर्जा हमारे जीवन में हमें सफकता दिलाती हैं। यहाँ आप स्वयं देखिये की दूसरा भाव वाणी का कारक भाव और धन कुटुंब का कारक भाव भी वही होता है। जब आप मौन रहेंगे तब कुटुंब के साथ साथ आपका धन भी बढ़ता चला जायेगा। 💢🌹🍀
💢🌹सावधानी : आसुरी प्रवृत्तियों की बलशाली अवस्था के चलते पूरी दुनिया में अमावस्या के दिन निर्माण कार्य मकान हो या कल कारखाने आदि के नहीं होते हैं। कल के दिन वाहन चलाने और किसी भी खतरनाक से लगने वाले  कामों में सावधानी जरुरी हैं।🍀
💢💢🙏 जय श्रीहरि 🙏💢
[सोमवार को होने से यह सोमवती आमावस्या भी कहा गया है
कहते हैं भगवान शिव संसार के कष्ट मिटाने इस दिन आते हैं ।
🌷जय शम्भो🌷
शुभमस्तु
Shri Tripursundari ved gurukulam
💐💐🙏🙏💐💐